डॉ. सतीश वर्मा, एक प्रतिष्ठित होम्योपैथ, मशहूर कवि और सेवा मंदिर के संस्थापक, का 11 नवंबर, 2024 को अजमेर में सुबह 1:30 बजे निधन हो गया। वह 91 वर्ष के थे। डॉ. वर्मा पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ थे और उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। उनके सुपुत्र डॉ. अविनाश वर्मा और सुपुत्री डॉ. स्मिता बिजलानी अजमेर पहुँच गए हैं, और आज, 12 नवंबर को, उनका अंतिम संस्कार पहाड़गंज स्थित स्वामी दयानंद सरस्वती मोक्षधाम पर संपन्न हुआ।

डॉ. सतीश वर्मा का जीवन एक आदर्श व्यक्तित्व और संवेदनशीलता का प्रतीक था। हमारे परिवार और उनके परिवार का रिश्ता वर्षों पुराना और आत्मीय था। उनके पिता श्री बिहारीलाल वर्मा और मेरे पिता श्री डी.ए. आप्टे दोनों ही रेलवे में कार्यरत थे और हम कचहरी रोड पर पास-पास के बंगलों, 417A और 417B, में रहते थे।
कॉलेज के दिनों से ही सतीश जी का झुकाव गहन अध्ययन और साहित्य की ओर था। खलील जिब्रान के लेखन से उन्हें विशेष लगाव था, और वे अक्सर उसकी किताबों में खोए रहते थे। साहित्यिक रुचि के साथ-साथ वे ‘लहर’ जैसी पत्रिकाओं में भी रुचि रखते थे, जो उस समय के साहित्यिक और सांस्कृतिक विचारों का एक मंच था। अपने लेखन और कविताओं के माध्यम से वे समाज की जटिलताओं को सहजता से प्रस्तुत करते और गहरी संवेदनशीलता से समाज को दिशा देने का प्रयास करते थे।
1960 में मेरी शादी के बाद, जब मैं मुंबई चली गई, तो धीरे-धीरे संपर्क कम हो गया। लेकिन फिर वर्ष 2000 में हमारी मुलाकात सेवा मंदिर में हुई। इतने वर्षों बाद भी सतीश जी का सेवा और समाज के प्रति समर्पण वैसा ही बना हुआ था। सेवा मंदिर के माध्यम से उन्होंने एक ऐसा केंद्र स्थापित किया, जो कल्याण परामर्श और सामुदायिक विकास का प्रतीक था। उनकी सोच और उनकी सेवाओं ने अजमेर और आसपास के क्षेत्रों के जीवन में एक अमिट छाप छोड़ी है।
अपनी चिकित्सा और समाज सेवा के प्रयासों के अलावा, डॉ. वर्मा ने हिंदी और अंग्रेजी में कविताओं के माध्यम से जीवन के गूढ़ रहस्यों और मानवता के मूल्यों पर गहरी दृष्टि डाली। उनकी कविताएं जीवन, प्रकृति और आत्मा की गहराइयों को खोजतीं और पाठकों को एक आत्मिक संवाद में लिप्त कर देतीं। उनकी संवेदनशीलता और करुणा ने उन्हें अपने समय के एक अनोखे साहित्यकार और समाजसेवी के रूप में स्थापित किया।
डॉ. सतीश वर्मा का जीवन हमेशा उन लोगों के दिलों में जीवित रहेगा, जिनके जीवन में उन्होंने अपनी सेवा और साहित्य के माध्यम से बदलाव लाया। उनकी विचारशीलता, उनकी सेवा की भावना, और उनकी कविताओं की अनुगूंज उनके परिवार, दोस्तों, और उन सभी में हमेशा जीवित रहेगी जिन्होंने उन्हें जाना और उनके कार्यों से प्रेरित हुए। उनके निधन से समाज में एक गहरा शून्य उत्पन्न हुआ है, पर उनकी विरासत का प्रभाव आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करता रहेगा।
लेखिका
प्रतिभा राजगुरु साहित्य और परोपकार के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित हस्ती हैं, जो अपनी व्यापक साहित्यिक क्षमता और पारिवारिक समर्पण के लिए जानी जाती हैं। हिंदी साहित्य, दर्शन और आयुर्वेद में उनकी गहरी विशेषज्ञता है। 1970 के दशक में, उन्होंने प्रमुख हिंदी साप्ताहिक पत्रिका धर्मयुग में संपादकीय भूमिका निभाई। वर्तमान में, वह अपनी पुस्तक संकल्प शक्ति और एक अलग काव्य संग्रह पर काम कर रही हैं, और अपनी साहित्यिक उपलब्धियों को प्रदर्शित करने के लिए प्रतिभा संवाद नामक डिजिटल मंच का संचालन कर रही हैं।
